शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

श्री हनुमान चालीसा

श्री हनुमान चालीसा 


दोहा  


श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि । 
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥ 
बुध्दिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार । 
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार ॥  


चौपाई 


जय हनुमान ज्ञान गुन सागर । जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥ 
राम दूत अतुलित बल धामा । अंजनि-पुत्र पवन सुत नामा ॥  
महाबीर बिक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी ॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा । कानन कुंडल कुंचित केसा ॥


हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै कांधे मूँज जनेऊ साजै ॥ 
संकर सुवन केसरीनंदन । तेज प्रताप महा जग बंदन ॥
बिद्यावान गुनी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर ॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । राम लखन सीता मन बसिया ॥


सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा । बिकट रूप धरि लंक जरावा ॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे । रामचंद्र के काज सँवारे ॥  
लाय सजीवन लखन जियाये । श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥ 
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई । तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥ 


सहस बदन तुम्हरो जस गावैं । अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं ॥ 
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा । नारद सारद सहित अहीसा ॥  
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते । कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा । राम मिलाय राज पद दीन्हा ॥ 


तुम्हरो मन्त्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना ॥
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू । लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं । जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥
दुर्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥  


राम दुआरे तुम रखवारे । होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥ 
सब सुख लहै तुम्हारी सरना । तुम रच्छक काहू को डर ना ॥  
आपन तेज सम्हारो आपै । तीनों लोक हाँक तें काँपै ॥ 
भूत पिसाच निकट नहिँ आवै । महाबीर जब नाम सुनावै ॥  


नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥ 
संकट तें हनुमान छुडावै । मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥  
सब पर राम तपस्वी राजा । तिन के काज सकल तुम साजा ॥ 
और मनोरथ जो कोइ लावै । सोइ अमित जीवन फल पावै ॥ 


चारों जुग परताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियारा ॥
साधु संत के तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे ॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता । अस बर दीन जानकी माता ॥
राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ॥ 


तुम्हरे भजन राम को पावै । जनम जनम के दुख बिसरावै ॥ 
अंत काल रघुबर पुर जाई । जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई ॥  
और देवता चित्त न धरई । हनुमत सेंइ सर्ब सुख करई ॥ 
संकट कटै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥ 


जै जै जै हनुमान गोसाईं । कृपा करहु गुरु देव की नाईं ॥ 
जो सत बर पाठ कर कोई । छूटहि बंदि महा सुख होई ॥ 
जो यह पढ़ै हनुमान चलीसा । होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा । कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥ 


दोहा  


पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप । 
राम लषन सीता सहित,हृदय बसहु सुर भूप ॥


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